शनिवार, 17 मार्च 2012

रिश्वत लिए वगैर....

रिश्वत लिए वगैर...

कविता नही सुनेगें,अब लिये दिये वगैर,
हम दाद नही देगें,कुछ खाए पिए वगैर!

श्रोता विहीन मंच को श्री हीन समझिए,
त्यौहार मुहर्रम हो,जैसे ताजिऐ बगैर!

क्या क्या हुआ आज तक कविता के नाम पर
गजलें नही चलेंगी अब काफिऐ बगैर!

उत्तर की प्रतीक्षा में है एक प्रश्न यह भी
कवि क्यों नही सुनते कविता,पिए बगैर!

जीवन के हर क्षेत्र में रिश्वत है जरूरी
श्रोता ही फिर सहे क्यों "धीर"रिश्वत लिये बगैर!

DHEERENDRA,"dheer"

34 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर....................
    आपको टिप्पणी रूपी रिश्वत भेंट कर रहा हूँ ।

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  2. ब्लोगर करेंगे टिपण्णी रिश्वत लिए बगैर .

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  3. कविता नही सुनेगें,अब लिये दिये वगैर,
    हम दाद नही देगें,कुछ खाए पिए वगैर!

    भाई साहब!
    आपने राह दिखा ही दी है। अब टिप्पणी ......
    !!!
    ??? (समझे)

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  4. रिश्वत नस-नस में बहे, बेबस "धीर" शरीर ।
    श्रोता-पाठक एक से, प्यासे छोड़ें तीर ।

    प्यासे छोड़ें तीर, तीर सब कवि के सहता ।
    विषय बड़ा गंभीर, कभी न कुछ भी कहता ।

    जाए टिप्पण छोड़, वाह री उसकी किस्मत ।
    चाहे बांह मरोड़, धरो पहले कुछ रिश्वत ।

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  5. बिना दिए तो टीप भी नहीं मिलती...!

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  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...
    आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 19-03-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  7. वाह ॥ रिश्वत ... पर तगड़ा व्यंग

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  8. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...
    हर तरफ़ रिश्वत ही रिश्वत...वाह!!!

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  9. :):) बढ़िया .... हर जगह रिश्वत का बोलबाला है

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  10. क्या लेनेदेने का प्रभाव कविता में भी आगया |कविता बहुत अच्छी लगी |
    आशा

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  11. Tiipani pahle vali nahin dikhi

    रिश्वत-मद नस-नस बहे, बेबस "धीर" शरीर ।
    श्रोता-पाठक एक से, प्यासे छोड़ें तीर ।
    प्यासे छोड़ें तीर, तीर सब कवि के सहता ।
    विषय बड़ा गंभीर, कभी न कुछ भी कहता ।
    जाए टिप्पण छोड़, वाह री उसकी किस्मत ।
    चाहे बांह मरोड़, धरो पहले कुछ रिश्वत ।

    उत्तर देंहटाएं
  12. wah...sah kaha aapne..rishwat ke bagair kahin bhi kaam nhi chalta

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  13. :-))
    ये सामजिक बुराई
    ब्लॉग पर भी छाई.......

    सर याद रखियेगा हमारी बिना नागा टिप्पणियों को.....
    :-)
    सादर.

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  14. नहीं हम कोई रिश्वत नहीं देंगें :)बहुत सुन्दर प्रस्तुति |

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  15. आज आपके ब्लॉग पर बहुत दिनों बाद आना हुआ. अल्प कालीन व्यस्तता के चलते मैं चाह कर भी आपकी रचनाएँ नहीं पढ़ पाया. व्यस्तता अभी बनी हुई है लेकिन मात्रा कम हो गयी है...:-)

    कमाल की ग़ज़ल...बेहतरीन लेखन ..बधाई स्वीकारें



    नीरज

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  16. जीवन के हर क्षेत्र में रिश्वत है जरूरी
    श्रोता ही फिर सहे क्यों "धीर"रिश्वत लिये बगैर!
    बहुत सुन्दर प्रस्तुति |

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  17. ....बहुत सुन्दर और भावमयी प्रस्तुति...

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  18. कविता नही सुनेगें,अब लिये दिये वगैर,
    हम दाद नही देगें,कुछ खाए पिए वगैर.

    मजेदार !, क्या बात कही धीरेन्द्र जी,... हम भी नहीं देंगे...

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  19. वाह बहुत खूब ! इस हाथ दे ...उस हाथ ले !!!!

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  20. मैंने टिप्पणी आकर दी ..देखिये रिश्वत लिए बगैर.
    अच्छी रचना ..मजेदार रचना

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  21. कल 26/03/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  22. बहुत सुंदर रचना,बेहतरीन भाव अभिव्यक्ति, इस रचना के लिए आभार " सवाई सिंह "

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  23. हम टिप्पणी भी क्यों दें
    रिश्वत लिए वगैर !

    खाली पीली शुभकामनायें :-))

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  24. जय हो आपकी.
    क्या खूब लिखतें हैं आप.
    आपका निराला अंदाज दिल चूरा लेता है.

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