गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

दो क्षणिकाऐ,...


दो क्षणिकाऐ,

कर्म-रहस्य,
यश
कर्म की प्रेरणा है,
उपलब्धि नही!
फल
कर्म की संगति है
परिधि नही
प्रेम
कर्म की साधना है,
नियति नही!


प्रमाण,

संयम का कष्ट
कितनी संतुष्टि देता है?
और
संतुष्टि का संयम
कितना कष्ट देता हैं?
क्या
कष्ट की भी संतुष्टि होती है
हां
मेरा जीवन
इसका प्रमाण है!

DHEERENDRA"dheer"

24 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत संवेदनशील रचना,बहुत ही सुंदरप्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  2. आप को सुगना फाऊंडेशन मेघलासिया,"राजपुरोहित समाज" आज का आगरा और एक्टिवे लाइफ
    ,एक ब्लॉग सबका ब्लॉग परिवार की तरफ से सभी को भगवन महावीर जयंती, भगवन हनुमान जयंती और गुड फ्राइडे के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं ॥
    आपका

    सवाई सिंह{आगरा }

    उत्तर देंहटाएं
  3. atisamvedan sheel post hae aapne bahut hi shandar likha hae.

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुंदर दोनों रचनाएँ !

    उत्तर देंहटाएं
  5. वह! वाह!---सुन्दर तत्व-दर्शन...बधाई धीरेन्द्र जी...
    ---और
    धीर ( धैर्य) ही.....यश है,
    कर्म-फ़ल है,
    सन्तुष्टि-संयम है...
    जीवन की परिधि व -
    नियति-नियामक है....।

    उत्तर देंहटाएं
  6. दोनों क्षणिकाएं जीवन दर्शन से भरी हैं...
    सुन्दर सार्थक भाव... शुभकामनाएं

    उत्तर देंहटाएं
  7. कमाल की ज्ञानपूर्ण प्रस्तुति है आपकी.
    बहुत बहुत आभार जी.
    महावीर जयंती और हनुमान जयंती की हार्दिक शुभकामनाएँ.

    उत्तर देंहटाएं
  8. अद्भुत प्रभावशाली विचार ।

    प्रेम
    कर्म की साधना है,
    नियति नही!

    बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  9. आप्त वचन सी है ये विचार कणिकाएं .

    उत्तर देंहटाएं
  10. फल
    कर्म की संगति है
    परिधि नही
    प्रेम
    कर्म की साधना है,
    नियति नही!....

    गहन चिन्तन कि उपज हैं ये शब्द....बेजोड़

    उत्तर देंहटाएं