रिश्वत लिए वगैर...कविता नही सुनेगें,अब लिये दिये वगैर,
हम दाद नही देगें,कुछ खाए पिए वगैर!
श्रोता विहीन मंच को श्री हीन समझिए,
त्यौहार मुहर्रम हो,जैसे ताजिऐ बगैर!
क्या क्या न हुआ आज तक कविता के नाम पर
गजलें नही चलेंगी अब काफिऐ बगैर!
उत्तर की प्रतीक्षा में है एक प्रश्न यह भी
कवि क्यों नही सुनते कविता,पिए बगैर!
जीवन के हर क्षेत्र में रिश्वत है जरूरी
श्रोता ही फिर सहे क्यों "धीर"रिश्वत लिये बगैर!
DHEERENDRA,"dheer"



